vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री चैतन्य भागवत
»
खण्ड 1: आदि-खण्ड
»
अध्याय 5: भिक्षु ब्राह्मण के भोग को ग्रहण करना
»
श्लोक 78
श्लोक
1.5.78
দুঃখে জগন্নাথ-মিশ্র নাহি তোলে মুখ
মাথা হেট করিযা ভাবেন মনে দুঃখ
दुःखे जगन्नाथ-मिश्र नाहि तोले मुख
माथा हेट करिया भावेन मने दुःख
अनुवाद
व्यथित होकर जगन्नाथ मिश्र अपना सिर भी नहीं उठा पाए। वे ज़मीन की ओर देखते रहे और बस विलाप करते रहे।
Jagannath Mishra was so distressed that he couldn't even lift his head. He stared at the ground and wailed.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×