श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 98-99
 
 
श्लोक  1.2.98-99 
নিগূঢে অনেক আর বৈসে নদীযায
পূর্বে সবে জন্মিলেন ঈশ্বর-আজ্ঞায
শ্রী চন্দ্রশেখর, জগদীশ, গোপীনাথ
শ্রীমান্, মুরারি, শ্রী গরুড, গঙ্গাদাস
निगूढे अनेक आर वैसे नदीयाय
पूर्वे सबे जन्मिलेन ईश्वर-आज्ञाय
श्री चन्द्रशेखर, जगदीश, गोपीनाथ
श्रीमान्, मुरारि, श्री गरुड, गङ्गादास
 
 
अनुवाद
कई अन्य भक्त नादिया में गुप्त रूप से रहते थे। भगवान की इच्छा से, श्री चंद्रशेखर, जगदीश, गोपीनाथ, श्रीमान पंडित, मुरारी गुप्ता, श्री गरुड़ पंडित और गंगादास सभी ने भगवान से पहले जन्म लिया।
 
Many other devotees lived secretly in Nadia. By the Lord's will, Sri Chandrashekhar, Jagadish, Gopinath, Sriman Pandit, Murari Gupta, Sri Garuda Pandit, and Gangadasa all took birth before the Lord.
तात्पर्य
निगूढे शब्द का अर्थ "अत्यंत गुप्त रूप से" या "छिपकर" है।

श्री जगदीश का वर्णन गौड़-गणोद्देश-दीपिका (192) में इस प्रकार किया गया है: "श्री जगदीश और हिरण्य पहले व्रज के यज्ञिक ब्राह्मणों की पत्नियों के रूप में प्रकट हुए थे। भगवान ने एकादशी के दिन विष्णु को अर्पित किए गए अनाज के लिए कहा।" गौड़-गणोद्देश-दीपिका (143) में यह भी कहा गया है: "चन्द्रहास, जो एक कुशल नर्तक और व्रज के भावों के ज्ञाता हैं, अब श्री जगदीश पंडित के रूप में प्रकट हुए हैं।" श्रीमान महाप्रभु के हिरण्य और जगदीश के घर एकादशी पर विष्णु को अर्पित किए गए अनाज को खाने का वर्णन चैतन्य-भागवत, आदि-कांड, अध्याय चार और चैतन्य-चरणामृत (आदि 11.30 और आदि 14.39) में मिलता है। अन्त्य-कांड (5.736) में भी कहा गया है: "श्री नित्यानंद प्रभु अपने सहयोगियों के साथ सबसे तेजस्वी श्री जगदीश पंडित के जीवन और धन हैं।"

श्री गोपीनाथ आचार्य, नवद्वीप में भगवान के ब्राह्मण साथी थे। वह सर्वभौम भट्टाचार्य के साले (बहन का पति) थे। गौड़-गणोद्देश-दीपिका (178) में कहा गया है: व्रज की प्राण-सखी गोपी रत्नावली अब सबसे शुद्ध गोपीनाथ आचार्य के रूप में प्रकट हुई है। दूसरों की राय के अनुसार, वह ब्रह्मा के अवतार थे। गौड़-गणोद्देश-दीपिका (75) में कहा गया है: "ब्रह्मांड के स्वामी और नव-व्यूहों में से एक भगवान ब्रह्मा, श्री गोपीनाथ आचार्य के रूप में प्रकट हुए हैं।" चैतन्य-चरणामृत (आदि 10.130) में भी कहा गया है: "सर्वभौम भट्टाचार्य थे, जो भगवान के पेड़ की सबसे बड़ी शाखाओं में से एक थे, और उनकी बहन के पति, श्री गोपीनाथ आचार्य।"

इस छंद में श्रीमान का तात्पर्य श्रीमान पंडित से है, जो नवद्वीप के निवासी थे और भगवान के कीर्तन के उद्घाटन में भागीदार थे। देवी के भाव में भगवान के नृत्य के समय, उन्होंने मशाल पकड़ा। चैतन्य-भागवत, मध्य-कांड, अध्याय अठारह में कहा गया है: "सभी भक्त खुशी से देख रहे थे जैसे शेर जैसे भगवान गौर दुर्गा के भाव में नाच रहे थे। श्रीमान पंडित ने भगवान के सामने एक मशाल पकड़ी।" चैतन्य-चरणामृत (आदि 10.37) में कहा गया है: "पंद्रहवीं शाखा श्रीमान पंडित थे, जो भगवान चैतन्य महाप्रभु के निरंतर सेवक थे। वह भगवान के नृत्य के दौरान मशाल ले जाया करते थे।"

श्री गरुड़ पंडित, नवद्वीप के निवासी और भगवान के सहयोगी थे। चैतन्य-भागवत (सीबी अंत्य-कांड 8.34) में कहा गया है: "जब श्री गरुड़ पंडित परमानंद में यात्रा कर रहे थे, तो पवित्र नाम का जाप करने की उनकी शक्ति के कारण एक सांप के जहर का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।" गौड़-गणोद्देश-दीपिका (117) में कहा गया है: "जो पहले गरुड़ के रूप में प्रकट हुए थे, वे अब श्री गरुड़ पंडित के रूप में प्रकट हुए हैं।" चैतन्य-चरणामृत (आदि 10.75) में कहा गया है: "गरुड़ पंडित, वृक्ष की सैंतीसवीं शाखा, हमेशा भगवान के शुभ नाम का जाप में लगे रहते थे। इस जाप की शक्ति के कारण, जहर का प्रभाव भी उन्हें छू नहीं सका।"

निमाई ने गंगादास पंडित से कलाप व्याकरण का अध्ययन किया। उनका निवास गंगानागर में भगवान के घर के पास था। गौड़-गणोद्देश-दीपिका (53) में कहा गया है: "वशिष्ठ मुनि, जो भगवान रामचंद्र के आध्यात्मिक गुरु थे, गंगादास और सुदर्शन के रूप में प्रकट हुए हैं।" गौड़-गणोद्देश-दीपिका (111) में यह भी कहा है: "गंगादास, जो भगवान को बहुत प्रिय हैं, पहले निधुवन के गोपियों के सम्मानित दुर्वासा थे।" चैतन्य-चरणामृत (आदि 10.29) में कहा गया है: "पंडित गंगादास, श्री चैतन्य महाप्रभु के पेड़ की आठवीं प्रिय शाखा थीं। जो उनकी गतिविधियों को याद करता है, वह सभी बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)