श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  1.2.81 
তুলসী-মঞ্জরী-সহিত গঙ্গা-জলে
নিরবধি সেবে কৃষ্ণে মহা-কুতূহলে
तुलसी-मञ्जरी-सहित गङ्गा-जले
निरवधि सेवे कृष्णे महा-कुतूहले
 
 
अनुवाद
श्री अद्वैत आचार्य उत्साहपूर्वक तुलसीदल और गंगाजल से कृष्ण की पूजा करते थे।
 
Sri Advaita Acharya enthusiastically worshipped Krishna with Tulsi leaves and Ganga water.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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