ये-ये-देश—गङ्गा-हरि-नाम-विवर्जित
ये-देशे पाण्डव नाहि गेल कदाचित्
से-सब जीवेरे कृष्ण वत्सल हैया
महा-भक्त सब जन्मायेन आज्ञा दिया
अनुवाद
भगवान कृष्ण ने करुणावश अपने महान भक्तों को आदेश दिया कि वे उन स्थानों पर प्रकट हों जहाँ गंगा नहीं बहती, जहाँ पवित्र नामों का जाप नहीं होता, तथा जहाँ पाण्डव नहीं गए।
Lord Krishna, out of compassion, ordered His great devotees to appear at places where the Ganga does not flow, where the holy names are not chanted, and where the Pandavas did not go.
तात्पर्य
इस पद के अर्थ के स्पष्टीकरण के लिए श्रीमद् भागवतम् (7.10.18-19 और 1.1.15) के निम्नलिखित पद देखे जा सकते हैं: "भगवान ने कहा: मेरे प्यारे प्रह्लाद, हे सबसे पवित्र, हे महान संत, तुम्हारे पिता आपके परिवार के इक्कीस पूर्वजों के साथ पवित्र हुए हैं। क्योंकि तुम इस परिवार में जन्मे थे, तो पूरे वंश को पवित्र किया गया है। जब भी और जहाँ भी शांतिपूर्ण, संतुलित भक्त होते हैं जो अच्छे व्यवहार वाले होते हैं और सभी अच्छे गुणों से सुशोभित होते हैं, तो वह स्थान और वहाँ के वंश, भले ही निंदा के पात्र हों, पवित्र हो जाते हैं।" और, "हे सूत, वे महान ऋषि जिन्होंने पूरी तरह से प्रभु के चरण कमलों की शरण ली है, वे तुरंत उन लोगों को पवित्र कर सकते हैं जो उनके संपर्क में आते हैं, जबकि गंगा का पानी लंबे उपयोग के बाद ही पवित्र कर सकता है।" उन स्थानों पर जाने के बाद प्रायश्चित की आवश्यकता होती है जहाँ कृष्ण के मित्र, पाण्डव नहीं गए, क्योंकि ऐसे स्थानों पर भक्त नहीं जाते हैं। पाण्डव कृष्ण के समान ही हैं, इसलिए उनके शासन के अधिकार क्षेत्र से बाहर के देशों के लोग पतित थे, भक्ति सेवा से रहित थे और भौतिक इंद्रिय सुख में लिप्त थे। द्वापर-युग में भगवान कृष्ण ने पाण्डवों को विभिन्न प्रांतों में भेजा और इस प्रकार अपने भक्त-वात्सल्य, अपने भक्तों के प्रति प्रेम की स्थापना की। इसी तरह, कलियुग में उदार व्यक्तित्व श्री गौरासुंदर ने अपने स्वयं के सहयोगियों को उन स्थानों पर भेजकर अपनी असाधारण उदारता का प्रदर्शन किया जहाँ कृष्ण ने पाण्डवों को भी नहीं भेजा था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥