भागवत गीता (2.72) पर अपनी टीका में माधवाचार्य ने पद्म पुराण के इस अंश को उद्धृत किया है: “अपनी मधुर इच्छा से वह विभिन्न रूपों का प्रदर्शन अपनी आंतरिक क्षमता से करता है। वह देवकी के गर्भ में वासुदेव से प्रकट नहीं हुआ। वह दशरथ से या जमदग्नि से जन्म नहीं लिया। बल्कि, वह परम आनंद का आनंद लेता है, जो शुद्ध, द्वंद्व रहित है।
