| श्री चैतन्य भागवत » खण्ड 1: आदि-खण्ड » अध्याय 2: भगवान का अवतरण » श्लोक 224 |
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| | | | श्लोक 1.2.224  | অনন্ত, ব্রহ্মা, শিব, আদি করি’ যত দেব,
সবেই নর-রূপধরি’ রে
গাযেন ’হরি’ ’হরি’, গ্রহণ-ছল করি’,
লখিতে কেহ নাহি পারি রে | अनन्त, ब्रह्मा, शिव, आदि करि’ यत देव,
सबेइ नर-रूपधरि’ रे
गायेन ’हरि’ ’हरि’, ग्रहण-छल करि’,
लखिते केह नाहि पारि रे | | | | | | अनुवाद | | अनंत, ब्रह्मा, शिव आदि देवता ग्रहण के बहाने मनुष्य रूप धारण करके "हरि! हरि!" का जाप करते हैं। फिर भी उन्हें कोई पहचान नहीं पाता। | | | | Under the pretext of an eclipse, gods like Ananta, Brahma, and Shiva take human form and chant "Hari! Hari!" Yet, no one recognizes them. | | ✨ ai-generated | | |
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