| श्री चैतन्य भागवत » खण्ड 1: आदि-खण्ड » अध्याय 2: भगवान का अवतरण » श्लोक 214 |
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| | | | श्लोक 1.2.214  | চন্দনে উজ্জ্বল, বক্ষ পরিসর,
দোলযে তথি বন-মালা
চাঙ্দ-সুশীতল, শ্রী-মুখ-মণ্ডল,
আ-জানু বাহু বিশাল | चन्दने उज्ज्वल, वक्ष परिसर,
दोलये तथि वन-माला
चाङ्द-सुशीतल, श्री-मुख-मण्डल,
आ-जानु बाहु विशाल | | | | | | अनुवाद | | भगवान का चौड़ा वक्षस्थल चमकीले चंदन से लिपा हुआ है और पुष्पमाला से सुशोभित है। भगवान का मधुर मुख पूर्णिमा के समान सुखदायक है और उनकी लंबी भुजाएँ घुटनों तक फैली हुई हैं। | | | | The Lord's broad chest is anointed with shining sandalwood paste and adorned with garlands of flowers. His sweet face is as soothing as the full moon, and His long arms stretch down to His knees. | | ✨ ai-generated | | |
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