श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 185-186
 
 
श्लोक  1.2.185-186 
সে প্রভু আপনে তুমি সাক্ষাত্ হৈযা
করিবা কীর্তন-প্রেম ভক্ত-গোষ্ঠী লৈযা
এ মহিমা, প্রভু, বর্ণিবার কার শক্তি?
তুমি বিলাইবা বেদ-গোপ্য বিষ্ণু-ভক্তি!
से प्रभु आपने तुमि साक्षात् हैया
करिबा कीर्तन-प्रेम भक्त-गोष्ठी लैया
ए महिमा, प्रभु, वर्णिबार कार शक्ति?
तुमि विलाइबा वेद-गोप्य विष्णु-भक्ति!
 
 
अनुवाद
"हे प्रभु, आप स्वयं प्रकट होंगे और अपने शुद्ध भक्तों के साथ कीर्तन करेंगे। हे प्रभु, आपकी महिमा का वर्णन करने की शक्ति किसमें है? आप भगवान विष्णु की ऐसी भक्ति सेवा वितरित करेंगे जो वेदों में अज्ञात है।
 
"O Lord, You will appear Yourself and perform kirtan with Your pure devotees. O Lord, who has the power to describe Your glories? You will distribute such devotional service to Lord Vishnu that is unknown in the Vedas.
तात्पर्य
"हे प्रभु गौरसुंदर ! आप वृजराज के पुत्र के निरंजन स्वर्ण रूप हैं। आप अपने सहयोगियों के साथ इस दुनिया में प्रकट होकर कीर्तन की प्रक्रिया के माध्यम से ईश्वर-प्रेम वितरण कर आनंदित होंगे। देवता और नर आपके गुणों का समुचित वर्णन करने में सक्षम नहीं हैं। देवताओं और मनुष्यों का ज्ञान सांसारिक है; कृष्ण की शुद्ध भक्ति वितरण करने का सबसे लाभकारी कार्य, जो कि वेदों में छिपा है और सभी के लिए प्रकट नहीं है, केवल गौर के रूप में आपके अवतार में ही संभव है।" श्री दामोदर स्वरूप प्रभु ने अपनी नोटबुक में लिखा है:

अनर्पित-चरीं चिरत् करुणयावतीर्णः कलौ

समर्पितुमुन्नतोjjवल-रसां स्व-भक्ति-श्रीयम्

हरिः पुरट-सुंदर-द्युति-कदंब-संदिप्तः

सदा हृदय-कंदरे स्फुरतु वः शची-नंदनः

"श्रीमती शचिदेवी के पुत्र के रूप में विख्यात सर्वोच्च भगवान, आपके हृदय के अंतरतम कोर में पारलौकिक रूप से स्थित हो सकते हैं। पिघले हुए सोने की चमक से सुशोभित, वह कलियुग में अपनी अकारण दया से अवतरित हुए हैं और ऐसा कुछ प्रदान कर रहे हैं जो किसी भी अवतार ने पहले कभी नहीं दिया है: भक्ति सेवा का सबसे उन्नत आनंद, प्रेम का आनंद।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)