"सत्य-युग में भगवान श्वेत और चार भुजाओं वाले हैं, उनके जटाएँ उलझी हुई हैं और वह पेड़ की छाल का वस्त्र पहने होते हैं। वह एक काले मृग की त्वचा, एक पवित्र धागा, प्रार्थना मोती और एक ब्रह्मचारी की छड़ी और जल पात्र रखते हैं।
"सत्य-युग के लोग शांतिपूर्ण, गैर-ईर्ष्यालु, हर प्राणी के अनुकूल और सभी परिस्थितियों में स्थिर होते हैं। वे तपस्वी ध्यान और आंतरिक और बाहरी इंद्रिय नियंत्रण द्वारा सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूजा करते हैं।
"सत्य-युग में भगवान की महिमा हंस, सुपर्ण, वैकुंठ, धर्म, योगेश्वर, अमल, ईश्वर, पुरुष, अव्यक्त और परमात्मा नामों से की जाती है।
"त्रेता-युग में भगवान एक लाल रंग के साथ प्रकट होते हैं। उनकी चार भुजाएँ हैं, सुनहरे बाल हैं, और वे तीन वेदों में से प्रत्येक में दीक्षा का प्रतिनिधित्व करने वाले तिगुने बेल्ट पहने हुए हैं। यज्ञ प्रदर्शन द्वारा पूजा के ज्ञान को अवतारित करते हुए, जो कि ऋग, साम, और यजुर्वेद में निहित है, उनके प्रतीक यज्ञ के करछुल, चम्मच, और अन्य उपकरण हैं।
"त्रेता-युग में, मानव समाज के वे सदस्य जो धार्मिकता में दृढ़ हैं और ईश्वरीय सत्य को प्राप्त करने में ईमानदारी से रुचि रखते हैं, वे भगवान हरि की पूजा करते हैं, जिसमें सभी देवता अपने अंदर समाहित हैं। भगवान की पूजा तीनों वेदों में सिखाए गए यज्ञ के अनुष्ठानों द्वारा की जाती है।
"त्रेता-युग में भगवान की महिमा विष्णु, यज्ञ, पृश्निगर्भ, सर्वदेव, उरुक्रम, वृषाकपि, जयंत और उरुगाय नामों से की जाती है।
"द्वापर-युग में सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान गहरे नीले रंग के साथ प्रकट होते हैं, पीले रंग के वस्त्र पहने होते हैं। इस अवतार में भगवान के दिव्य शरीर को श्रीवत्स और अन्य विशिष्ट आभूषणों द्वारा चिह्नित किया गया है, और वह अपने व्यक्तिगत हथियारों को प्रकट करता है।
"कलियुग में, बुद्धिमान व्यक्ति भगवान के अवतार की पूजा करने के लिए सामूहिक मंत्र का पाठ करते हैं जो लगातार कृष्ण के नाम गाता है। हालाँकि उनका रंग काला नहीं है, वह स्वयं कृष्ण हैं। उनके साथ उनके सहयोगी, सेवक, हथियार और गोपनीय साथी हैं।"
श्रीमद् भागवतम (1.3.26) में कहीं और कहा गया है: "हे ब्राह्मणों, भगवान के अवतार असंख्य हैं, जैसे पानी के अटूट स्रोतों से बहने वाली नदियाँ।"
