“आप कलियुग में स्वर्ण वर्ण वाले ब्राह्मण के रूप में प्रकट होकर पवित्र नामों के सामूहिक जप का उद्घाटन करते हैं, जो वेदों में अज्ञात है।
“You appear in the Kaliyuga as a golden-complexioned brahmana and inaugurate the congregational chanting of the holy names, which is unknown in the Vedas.
तात्पर्य
प्रत्यक्ष ज्ञान अर्थात प्रत्यक्ष अनुभव के माध्यम से प्राप्त भौतिक ज्ञान और अनुमान अर्थात परिकल्पित समझ के आधार पर निर्मित वैदिक साहित्य एकमात्र भौतिक सुख भोगने के लिए उपयुक्त हैं। यद्यपि संविधानगत कर्तव्य, अर्थात भगवान के गुणों का गुणगान, वेदों द्वारा सीधे प्रचारित नहीं किए जाते, फिर भी वे इस संसार में भक्तिपूर्ण सेवा के रूप में प्रदर्शित होते हैं, जो अदृश्य (भौतिक धारणा के परे), सद-धर्म-प्रणेता (धार्मिक संहिताओं के निदेशक), भागवत-धर्म-ज्ञ (वैष्णव धार्मिक सिद्धांतों के जानकार) और वेद-गोप्ता (वेदों के रक्षक) हैं। दूसरे शब्दों में, भगवान के पवित्र नामों का उच्चारण एक आध्यात्मिक तत्व है जो भगवान विष्णु से भिन्न नहीं है। कलि-युग-अवतार शब्द का तात्पर्य श्री चैतन्य से है, जो सोने के रंग के हैं, जो विश्व के आध्यात्मिक गुरु हैं और संकीर्तन आंदोलन के ब्राह्मण आरंभकर्ता हैं। भगवान के पवित्र नामों और रूपों की निश्चित सेवा द्वापर-युग में मंदिर पूजा, त्रेता-युग में यज्ञ प्रदर्शन और सतयुग में ध्यान है। एक शिक्षक के रूप में, भगवान सभी चार युगों के धार्मिक सिद्धांतों का प्रचार करते हैं और इस प्रकार एक आध्यात्मिक गुरु या आचार्य के रूप में कार्य करते हैं। भगवान ने यह भी बताया कि सतयुग में व्यक्ति को ब्रह्मचारी रहना चाहिए, त्रेता-युग में गृहस्थ रहना चाहिए, द्वापर-युग में वानप्रस्थ रहना चाहिए और कलियुग में संन्यासी रहना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥