श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 162
 
 
श्लोक  1.2.162 
কৃষ্ণাজিন, দণ্ড, কমণ্ডলু, জটা ধরি’
ধর্ম স্থাপ’ ব্রহ্মচারি-রূপে অবতরি’
कृष्णाजिन, दण्ड, कमण्डलु, जटा धरि’
धर्म स्थाप’ ब्रह्मचारि-रूपे अवतरि’
 
 
अनुवाद
आप मृगचर्म धारण करते हैं, दण्ड और जलपात्र धारण करते हैं, तथा जटाधारी हैं। इस प्रकार आप धर्म की पुनर्स्थापना के लिए ब्रह्मचारी रूप में अवतरित हुए हैं।
 
You wear a deer skin, carry a staff and a water pot, and have matted hair. Thus, you have incarnated as a Brahmachari to restore Dharma.
तात्पर्य
कृष्णाजिन शब्द चित्तीदार हिरण की खाल को संदर्भित करता है, जिसे ब्रह्मचारियों द्वारा बलिदान संबंधी अनुष्ठानों के समय पहना जाता है। दंड शब्द का अर्थ एकदंड या त्रिदंड से है, जो पलाश, खैर या बाँस के डंडों से बनाये जाते हैं। दूसरे शब्दों में, वज्र-दंड, इंद्र-दंड, ब्रह्मा-दंड और जीव-दंड को एक साथ मिलाकर त्रिदंड के रूप में जाना जाता है। कमंडलु शब्द लकड़ी या लौकी से बने जलपात्र को संदर्भित करता है। जटा शब्द बालों के गुच्छे को संदर्भित करता है जो बिना मुँड़ने के कारण उलझ गए हैं।

ब्रह्मचारी हमेशा गृहस्थों की तरह मुँड़ने का अवसर नहीं पाते हैं। इसलिए वे अक्सर अपने बाल और नाखून बढ़ाकर रखते हैं। आरामदायक घरों में रहने वालों के लिए, बाल और नाखून बढ़ाकर रखना एक असभ्य व्यक्ति का लक्षण है, किंतु ब्रह्मचारियों को इस मामले में कुछ रियायत है। ब्रह्मचारी आश्रम में नहीं रहने वालों को इस मामले में कोई अधिकार नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)