श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  1.2.132 
মহা-জয-জয-ধ্বনি, পুষ্প-বরিষণ
সঙ্গোপে দেবতা-গণ করিলা তখন
महा-जय-जय-ध्वनि, पुष्प-वरिषण
सङ्गोपे देवता-गण करिला तखन
 
 
अनुवाद
मनुष्यों के लिए अदृश्य, देवताओं ने ऊंचे स्वर में “जय! जय!” का जाप किया और फूलों की वर्षा की।
 
Invisible to humans, the gods loudly chanted "Jai! Jai!" and showered flowers.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)