श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  1.2.110 
কিছু নাহি জানে লোক ধন-পুত্র-আশে
সকল পাষণ্ডী মেলি’ বৈষ্ণবেরে হাসে
किछु नाहि जाने लोक धन-पुत्र-आशे
सकल पाषण्डी मेलि’ वैष्णवेरे हासे
 
 
अनुवाद
लोग इनमें से कुछ भी बात समझ नहीं पाते थे क्योंकि उनके हृदय धन और संतान की लालसा से भरे हुए थे। सभी नास्तिक वैष्णवों पर हँसते थे।
 
People could not understand any of this because their hearts were filled with the desire for wealth and children. All atheists laughed at the Vaishnavas.
तात्पर्य
क्योंकि भौतिकवादी अमीरी और बच्चों को ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य मानते हैं, वो न तो शुद्ध वैष्णवों को पहचान सकते हैं और न ही संकीर्तन के उद्देश्य को समझ सकते हैं। वैष्णवों के कार्यों को देखकर उन्हें अचंभा होता है, लेकिन वो उन कार्यों के पीछे के वास्तविक उद्देश्य को समझने में असमर्थ होते हैं और उनका उपहास करते हैं और उन पर हँसते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)