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श्लोक 1.16.262  |
প্রতি-দিন উচ্চারণ করিযা কি কায?”
এই-রূপে বলে যত মধ্যস্থ-সমাজ |
प्रति-दिन उच्चारण करिया कि काय?”
एइ-रूपे बले यत मध्यस्थ-समाज |
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| अनुवाद |
| “प्रतिदिन भगवान का नाम जपने की क्या आवश्यकता है?” इस प्रकार नास्तिकों ने भक्तों की अनेक प्रकार से निंदा की। |
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| "What is the need to chant the name of God every day?" Thus the atheists criticized the devotees in many ways. |
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