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श्लोक 1.16.133  |
কৃষ্ণানন্দ-সুধা-সিন্ধু-মধ্যে হরিদাস
মগ্ন হৈ’ আছেন, বাহ্য নাহি পরকাশ |
कृष्णानन्द-सुधा-सिन्धु-मध्ये हरिदास
मग्न है’ आछेन, बाह्य नाहि परकाश |
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| अनुवाद |
| हरिदास कृष्ण के प्रेम के अमृत सागर में लीन रहे और उन्हें कोई बाह्य भावना नहीं थी। |
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| Haridas remained absorbed in the nectarine ocean of love for Krishna and had no external feelings. |
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