श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 15: श्री विष्णुप्रिया के साथ विवाह  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  1.15.95 
এই-মত মালায, চন্দনে, গুযা-পানে
হৈলা অনন্ত, মর্ম কেহ নাহি জানে
एइ-मत मालाय, चन्दने, गुया-पाने
हैला अनन्त, मर्म केह नाहि जाने
 
 
अनुवाद
इस प्रकार कोई भी यह नहीं समझ सका कि भगवान की सेवा अनंत शेष ने माला, चंदन और पान के रूप में किस प्रकार की थी।
 
Thus no one could understand how Ananta Sesha served the Lord in the form of garlands, sandalwood paste and betel leaves.
तात्पर्य
इस श्लोक में अनंत शब्द श्री शेष संकर्षण का वाचक है या फिर 'असंख्य' अर्थ में प्रयुक्त है। (निम्नलिखित श्लोक 118 देखें।)
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)