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श्लोक 1.14.94-96  |
সহস্র সহস্র শিষ্য হৈল তথাই
হেন নাহি জানি,—কে পডযে কোন্ ঠাঞি
শুনি’ সব বঙ্গ-দেশী আইসে ধাইযা
’নিমাই-পণ্ডিত স্থানে পডিবাঙ গিযা’
হেন কৃপা-দৃষ্ট্যে প্রভু করেন ব্যাখ্যান
দুই মাসে সবেই হৈল বিদ্যাবান্ |
सहस्र सहस्र शिष्य हैल तथाइ
हेन नाहि जानि,—के पडये कोन् ठाञि
शुनि’ सब बङ्ग-देशी आइसे धाइया
’निमाइ-पण्डित स्थाने पडिबाङ गिया’
हेन कृपा-दृष्ट्ये प्रभु करेन व्याख्यान
दुइ मासे सबेइ हैल विद्यावान् |
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| अनुवाद |
| वहाँ उनके हज़ारों-हज़ार शिष्य थे, इसलिए यह जानना मुश्किल है कि कौन किसके साथ पढ़ता था। पूर्वी बंगाल के कोने-कोने से लोग निमाई पंडित से शिक्षा लेने दौड़े चले आते थे। भगवान ने उन्हें इतनी कृपापूर्वक शिक्षा दी कि दो महीने के भीतर ही सभी विद्वान बन गए। |
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| He had thousands of disciples, so it's difficult to know who studied with whom. People from all over East Bengal flocked to Nimai Pandit for instruction. Bhagavan taught them so graciously that within two months, all of them became scholars. |
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