श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 13: डिगविजयी को पराजित करना  »  श्लोक 160-162
 
 
श्लोक  1.13.160-162 
গৌড, ত্রিহুত, দিল্লী, কাশী-আদি করি’
গুজরাত, বিজয-নগর, কাঞ্চী-পুরী
অঙ্গ, বঙ্গ, তৈলঙ্গ, ওঢ্র, দেশ আর কত
পণ্ডিতের সমাজ সṁসারে আছে যত
দূষিবে আমার বাক্য,—সে থাকুক দূরে
বুঝিতেই কোন জন শক্তি নাহি ধরে
गौड, त्रिहुत, दिल्ली, काशी-आदि करि’
गुजरात, विजय-नगर, काञ्ची-पुरी
अङ्ग, बङ्ग, तैलङ्ग, ओढ्र, देश आर कत
पण्डितेर समाज सꣳसारे आछे यत
दूषिबे आमार वाक्य,—से थाकुक दूरे
बुझितेइ कोन जन शक्ति नाहि धरे
 
 
अनुवाद
"मैं जहाँ भी गया, वहाँ मुझे असंख्य विद्वान मिले—गौड़, त्रिहुत, दिल्ली, काशी, गुजरात, विजयनगर, कांचीपुर, अंग, बंगाल, आंध्र, उड़ीसा। मेरे कथनों का खंडन तो दूर, उनमें से किसी विद्वान में उन्हें समझने की भी शक्ति नहीं थी।
 
"Wherever I went, I met countless scholars—Gauda, ​​Trihuta, Delhi, Kashi, Gujarat, Vijayanagar, Kanchipur, Anga, Bengal, Andhra, Orissa. Far from refuting my statements, none of them had the power to even understand them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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