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श्लोक 1.12.264-265  |
কালিন্দীর তীরে যেন শ্রী-নন্দ-কুমার
গোপ-বৃন্দ-মধ্যে বসি’ করিলা বিহার
সেই গোপ-বৃন্দ লৈ’ সেই কৃষ্ণচন্দ্র
বুঝি,—দ্বিজ-রূপে গঙ্গা-তীরে করে রঙ্গ |
कालिन्दीर तीरे येन श्री-नन्द-कुमार
गोप-वृन्द-मध्ये वसि’ करिला विहार
सेइ गोप-वृन्द लै’ सेइ कृष्णचन्द्र
बुझि,—द्विज-रूपे गङ्गा-तीरे करे रङ्ग |
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| अनुवाद |
| जिस प्रकार नन्दपुत्र ने यमुना के तट पर ग्वालबालों के बीच बैठकर लीला का आनन्द लिया था, उसी प्रकार वही कृष्ण ब्राह्मण रूप में गंगा के तट पर उन्हीं ग्वालबालों के साथ बैठकर लीला का आनन्द ले रहे थे। |
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| Just as Nanda's son had enjoyed the play sitting among the cowherds on the banks of Yamuna, in the same way the same Krishna in the form of a Brahmin was enjoying the play sitting with the same cowherds on the banks of Ganga. |
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