केह बोले,—“ज्ञान-योग एडिया विचार
उद्धतेर प्राय नृत्य,—ए कोन् व्यभार?”
अनुवाद
एक अन्य ने कहा, "उन्होंने ज्ञान की साधना छोड़कर पागलों की तरह नाचना शुरू कर दिया है। यह कैसा व्यवहार है?"
Another said, "He has given up the pursuit of knowledge and has started dancing like a mad man. What kind of behavior is this?"
तात्पर्य
व्यक्तिगत ब्राह्मण पर विचार करना ज्ञान कहलाता है। वेदांती यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यह ज्ञान ही जीवन का लक्ष्य है। वे वस्तुएँ जिनका उपयोग कृष्ण के विरोधी संकल्पित जीवों के इंद्रिय सुखों के लिए किया जाता है, विषय या इंद्रिय वस्तु के रूप में जानी जाती हैं। ऐसी वस्तुओं के प्रति उदासीन रहना या अपने मन को उन वस्तुओं से रोकना योग कहलाता है। जो व्यक्ति एकेश्वरवाद के दर्शन का पालन करते हैं, वे ब्राह्मण या भगवान में विलय को जीवों का अंतिम लक्ष्य मानते हैं। उनकी साधना भी अवैयक्तिक वेदांत और अष्टांग-योग-शास्त्रों पर आधारित है। हालाँकि, भगवान की भक्ति सेवा कभी भी इस तरह के घृणित और अप्रिय अस्थायी छल का उत्पादन नहीं करती है। भगवान की सेवा के लिए इच्छुक व्यक्तियों में पाई जाने वाली बेचैनी इंद्रिय तृप्ति के कारण नहीं है। लेकिन चूंकि अवैयक्तिकवादी और योगी संकीर्णता के स्तर पर स्थित हैं, वे भगवान के भक्तों के प्रयासों को समझने में असमर्थ हैं। इसकी पुष्टि श्रीमद् भागवतम् (11.2.40) में निम्नलिखित शब्दों में की गई है: "जब कोई व्यक्ति वास्तव में उन्नत होता है और भगवान के पवित्र नाम का जाप करने में आनंद लेता है, जो उसे बहुत प्रिय है, तो वह उत्तेजित होता है और जोर-जोर से पवित्र नाम का जाप करता है। वह हंसता भी है, रोता भी है, उत्तेजित हो जाता है और पागल की तरह जप करता है, बाहरी लोगों की परवाह नहीं करता।" अभिधेय के विचार में, ज्ञानी और योगियों द्वारा अपनाई जाने वाली अस्थायी साधनाओं को भक्तों द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता है। वे जानते हैं कि नित्य मुक्त आत्माओं की सेवा के अनुकूल गतिविधियों को अभिधेय-साधना-भक्ति के रूप में जाना जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि आउल्स, बाउल्स, करताबाजस, सहजियास, सकीभिकिस, स्मार्टस और अतिवादियों के द्वैतपूर्ण कृत्रिम श्रवण, जप, नृत्य और वाद्ययंत्र बजाने के बहाने इंद्रिय तृप्ति को साधना, या शुद्ध भक्ति सेवा की खेती के रूप में अनुमोदित किया गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥