श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 11: श्री ईश्वर पुरी से मिलन  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  1.11.53 
শুনিলেই কীর্তন, করযে পরিহাস
কেহ বোলে,—“সব পেট পুষিবার আশ”
शुनिलेइ कीर्तन, करये परिहास
केह बोले,—“सब पेट पुषिबार आश”
 
 
अनुवाद
ऐसे लोगों ने जैसे ही भक्तों का कीर्तन सुना, उन्होंने भक्तों पर ताना मारा। किसी ने कहा, "यह तो बस पेट भरने का साधन है।"
 
As soon as such people heard the devotees singing kirtan, they taunted them. Someone said, "This is just a way to fill your stomach."
तात्पर्य
माया के उपदेश से प्रेरित होकर नदिया के सभी निवासी अपनी स्त्री, बालकों के मोह और संपत्ति संचय एवं पांडित्य के घमंड में अत्यंत उन्मत्त हो गये थे। इसीलिए वे भगवान हरि की सेवा से विमुख हो गये थे। उनके हृदय में न तो भगवान के गुणगान को सुनने की तनिक भी लालसा न थी और न ही कृष्ण के नाम संकीर्तन को वे उसकी महत्ता के अनुरूप पहचान पाए थे। इसलिए वे भगवान की सेवा की उपेक्षा करते और उसकी खिल्ली उड़ाते थे। वे भगवान की सेवा के लिए होने वाले हरि कीर्तन को अर्थ-कामी कर्मवादियों के पेट भरने का साधारण साधन समझते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)