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श्लोक 1.10.45  |
এই-মত বৈকুণ্ঠ নাযক বিদ্যা-রসে
ক্রীডা করে, চিনিতে না পারে কোন দাসে |
एइ-मत वैकुण्ठ नायक विद्या-रसे
क्रीडा करे, चिनिते ना पारे कोन दासे |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार वैकुण्ठ के स्वामी ने विद्वान के रूप में आनन्दपूर्वक अपना जीवन बिताया, फिर भी उनका कोई भी सेवक उन्हें पहचान नहीं सका। |
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| Thus the Lord of Vaikuntha lived his life happily as a scholar, yet none of his servants could recognize him. |
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