श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.9.7 
अथ प्रीतोपरसः —
कृष्णस्याग्रे’तिधार्ष्ट्येन तद्-भक्तेष्व् अवहेलया ।
स्वाभीष्ट-देवतान्यत्र परमोत्कर्ष-वीक्षया ।
मर्यादातिक्रमाद्यैश् च प्रीतोपरसता मता ॥४.९.७॥
 
 
अनुवाद
"प्रीतोपरास (दास्योपरास) भगवान की उपस्थिति में दुस्साहस दिखाने, उनके भक्तों का अनादर करने, देवताओं को भगवान से अधिक महत्वपूर्ण समझने और नियमों की अनदेखी करने से उत्पन्न होती है।"
 
"Pritoparas (Dasyoparas) arises from showing audacity in the presence of the Lord, disrespecting His devotees, considering the gods more important than the Lord and ignoring the rules."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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