vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री भक्ति रसामृत सिंधु
»
सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस
»
लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)
»
श्लोक 37
श्लोक
4.9.37
अष्टाव् अमी तटस्थेषु प्राकट्यं यदि बिभ्रति ।
कृष्णादिभिर् विभावाद्यैर् गतैर् अनुभवाध्वनि ॥४.९.३७॥
अनुवाद
"यदि सात द्वितीयक रस या शांत-रस कृष्ण को विभाव आदि के रूप में लेकर तटस्थ भक्तों में प्रकट होते हैं, तो भी इसे अनुरस माना जाता है।"
"If the seven secondary rasas or Shanta-rasas appear in neutral devotees taking Krishna as vibhava etc., it is still considered as anurasa."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×