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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस
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लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)
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श्लोक 36
श्लोक
4.9.36
एवम् एवात्र विज्ञेया वीरादेर् अप्य् उदाहृतिः ॥४.९.३६॥
अनुवाद
“वीर और अन्य गौण रसों के लिए अनुरास को इसी प्रकार समझा जाना चाहिए।”
“Anuras should be understood in the same way for Veer and other minor rasas.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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