श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  4.9.35 
अथ अद्भुतानुरसः —
भाण्डीर-कक्षे बहुधा वितण्डां
वेदान्त-तन्त्रे शुक-मण्डलस्य ।
आकर्णयन् निर्निमिषाक्षि-पक्ष्मा
रोमाञ्चिताङ्गश् च सुरर्षिर् आसीत् ॥४.९.३५॥
 
 
अनुवाद
अद्भुतानुरास का एक उदाहरण: "भाण्डिर वृक्ष पर चढ़े तोतों के बीच वेदान्त पर हो रही लम्बी बहस को सुनकर, नारद की आँखें आश्चर्य से झपकना बंद हो गईं और उनके रोंगटे खड़े हो गए।"
 
An example of Adbhutanurasa: "Listening to the long discussion on Vedanta between the parrots on the Bhandhira tree, Narada's eyes stopped blinking in astonishment and his hair stood on end."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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