श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.9.33 
अथ अनुरसाः —
भक्तादिभिर् विभावाद्यैः कृष्ण-सम्बन्ध-वर्जितैः ।
रसा हास्यादयः सप्त शान्तश् चानुरसा मताः ॥४.९.३३॥
 
 
अनुवाद
"यदि आलंबन और अन्य तत्वों के रूप में भक्तगण किसी विशेष रस को व्यक्त करते समय कृष्ण के साथ संबंध से रहित होते हैं, तो सात द्वितीयक रसों और शांत-रस के लिए अनुरास उत्पन्न होता है।"
 
"If the devotees are devoid of connection with Krishna while expressing a particular rasa in the form of alambana and other elements, then anurasa arises for the seven secondary rasas and Shanta-rasa."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)