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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस
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लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)
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श्लोक 32
श्लोक
4.9.32
एवम् एव तु गौणानां हासादीनाम् अपि स्वयम् ।
विज्ञेयोपरसत्वस्य मनीषिभिर् उदाहृतिः ॥४.९.३२॥
अनुवाद
"इसी प्रकार, बुद्धिमान लोग हास्य आदि गौण रसों के उपरसों को समझने में समर्थ होते हैं।"
"Similarly, intelligent people are able to understand the sub-rasas of the minor rasas like humour etc."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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