श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  4.9.31 
यथा —
कान्त कैलास-कुञ्जो’यं रम्याहं नव-यौवना ।
त्वं विदग्धो’सि गोविन्द किं वा वाच्यम् अतः परम् ॥४.९.३१॥
 
 
अनुवाद
"हे मेरे प्रेमी! हे गोविंद! कैलाश पर्वत पर कुंज में निवास करते हुए, मैं उत्तरकालीन कैसर आयु का और आकर्षक हूँ, और आप प्रेम-संबंधों में चतुर हैं। इससे अधिक क्या कहा जा सकता है?"
 
"O my lover! O Govinda! Dwelling in the grove on Mount Kailash, I am of late Kaiser age and attractive, and you are clever in love affairs. What more can be said?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)