श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  4.9.24 
शुचित्वौज्ज्वल्य-वैदिग्ध्यात् सुवेशत्वाच् च कथ्यते ।
शृङ्गारस्य विभावत्वम् अन्यत्राभासता ततः ॥४.९.२४॥
 
 
अनुवाद
"कहा जाता है कि मधुर-रस के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ शुद्धता, उपयुक्त रूप और प्रजाति, प्रेम में चतुराई और अच्छे परिधान से उत्पन्न होती हैं। आलंबन में इन गुणों का अभाव मधुर-रस के विभाव में आभास उत्पन्न करता है।"
 
"It is said that the conditions suitable for madhura-rasa are produced by purity, appropriate form and species, cleverness in love, and good attire. The absence of these qualities in the ālambāna produces the appearance of madhura-rasa in the vibhāva."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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