श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.9.19 
तत्र लता, यथा —
सखि मधु किरती निशम्य वंशीं
मधु-मथनेन कटाक्षिताथ मृद्वी ।
मुकुल-पुलकिता लतावलीयं
रतिम् इह पल्लवितां हृदि व्यनक्ति ॥४.९.१९॥
 
 
अनुवाद
लताएँ: "कृष्ण की दृष्टि से कोमल हो चुकी लताएँ उनकी बाँसुरी की ध्वनि सुनकर मधुरस से सराबोर हो रही हैं। वे अपने अंगों पर उगी कलियों के रूप में रोंगटे खड़े करके अपने हृदय में उगे कृष्ण-प्रेम को प्रकट करती हैं।"
 
The creepers: "The creepers, softened by Krishna's sight, are filled with sweetness upon hearing the sound of his flute. They express the love for Krishna that grows in their hearts by raising goosebumps in the form of buds on their bodies."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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