श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.9.18 
विभाव-वैरूप्यम् —
वैदग्ध्यौज्ज्वल्य-विरहो विभावस्य विरूपता ।
लता-पशु-पुलिन्दीषु वृद्धास्व् अपि स वर्तते ॥४.९.१८॥
 
 
अनुवाद
"जहाँ चतुराई, उपयुक्तता, उत्तम वेश-भूषा और पवित्रता का अभाव है, वहाँ विभाव (आश्रयों) में अनियमितता है। यह अनियमितता लताओं, पशुओं, पुलिंद स्त्रियों और वृद्धाओं में विद्यमान है।"
 
"Where there is lack of cleverness, appropriateness, good dress and purity, there is irregularity in the vibhavas (asthas). This irregularity exists in creepers, animals, filial women and old women."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)