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श्लोक 4.9.17  |
केचित् तु नायकस्यापि सर्वथा तुल्य-रागतः ।
नायिकास्व् अप्य् अनेकासु वदन्त्य् उपरसं शुचिम् ॥४.९.१७॥ |
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| अनुवाद |
| "कुछ लोग कहते हैं कि मधुरोपरासा तब उत्पन्न होती है जब पुरुष प्रेमी अनेक प्रकार की स्त्रियों में भेद नहीं करता तथा सभी के साथ समान व्यवहार करता है।" |
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| "Some say that Madhuroprasa arises when the male lover does not discriminate between different types of women and treats all of them equally." |
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