श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.9.14 
तत्र एकत्र रतिर्, यथा ललित-माधवे —
मन्द-स्मितं प्रकृति-सिद्धम् अपि व्युदन्तं
सङ्गोपितश् च सहजो’पि दृशोस् तरङ्गः ।
धूमायिते द्विज-वधू-मदनार्ति-वह्नाव्
अह्नाय कापि गैत्रि अङ्कुरिताम् अयासीत् ॥४.९.१४॥
 
 
अनुवाद
ललिता-माधव द्वारा एकतरफ़ा प्रेम: "यद्यपि ब्राह्मण पत्नियों में कामदेव की अग्नि सुलगने लगी थी, कृष्ण ने उनकी सहज, मधुर मुस्कान को नज़रअंदाज़ कर दिया। उन्होंने अपनी आँखों से बेचैन नज़रों को छिपा लिया। कृष्ण के मन में एक अवर्णनीय शांति का भाव प्रकट हुआ।"
 
Unrequited Love by Lalita-Madhava: "Although the fire of Kamadeva was beginning to ignite in the Brahmin wives, Krishna ignored their easy, sweet smiles. They hid the restless glances from their eyes. An indescribable sense of peace descended upon Krishna's mind."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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