श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 9: रसाभास (रसों की अधूरी अभिव्यंजना)  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  4.9.13 
अथ शृङ्गारोपरसः । तत्र स्थायि-वैरूप्यम् —
द्वयोर् एकतरस्यैव रतिर् या खलु दृश्यते ।
यान् एकत्र तथैकस्य स्थायिनः सा विरूपता ।
विभावस्यैव वैरूप्यं स्थायिन्य् अत्रोपचर्यते ॥४.९.१३॥
 
 
अनुवाद
मधुरोपराश: "मधुर-रस का स्थाई भाव वहाँ विकृत हो जाता है जहाँ दो व्यक्तियों के बीच प्रेम एकतरफ़ा होता है या जहाँ एक व्यक्ति के कई प्रेमी होते हैं। विभाव के विकृत होने से स्थाई भाव में भी विकृति आ जाती है।"
 
Madhuroparasha: "The permanent emotion of the sweet rasa gets distorted where the love between two people is one-sided or where one person has many lovers. When the vibhava gets distorted, the permanent emotion also gets distorted."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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