| श्री भक्ति रसामृत सिंधु » सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस » लहर 7: वीभत्स-रस (भीषणता) » श्लोक 5 |
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| | | | श्लोक 4.7.5  | इह ग्लानि-श्रमोन्माद-मोह-निर्वेद-दीनताः ।
विषाद-चापलावेग-जाड्याद्यो व्यभिचारिणः ॥४.७.५॥ | | | | | | अनुवाद | | "इस रस के व्यभिचारी-भाव हैं ग्लानि, श्रम, उन्माद, मोह, निर्वेद, दैन्य, विषाद, चापाल्य और जाद्यम।" | | | | "The adulterous emotions of this rasa are remorse, exertion, madness, attachment, indifference, poverty, sadness, restlessness and cruelty." | | ✨ ai-generated | | |
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