श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 7: वीभत्स-रस (भीषणता)  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.7.12 
लब्ध-कृष्ण-रतेर् एव सुष्ठु पूतं मनः सदा ।
क्षुभ्यत्य् अहृद्य् अलेशे’पि ततो’स्यां रत्य्-अनुग्रहः ॥४.७.१२॥
 
 
अनुवाद
"जिन लोगों ने कृष्ण के लिए रति प्राप्त कर ली है, उनके शुद्ध मन थोड़ी सी भी अवांछित बातों से विचलित हो जाते हैं। इस प्रकार जुगुप्सा-रति में प्राथमिक रति का पोषण होता है।"
 
"Those who have attained love for Krishna, their pure minds are disturbed by even the slightest undesirable thing. Thus, primary love is nourished in disgust-love."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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