श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 7: वीभत्स-रस (भीषणता)  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.7.11 
यथा वा —
घ्राणोद्घूर्णक-पूत-गन्धि-विकटे कीटाकुले देहली-
स्रस्त-व्याधित-यूथ-गूथ-घटना-निर्धूत-नेत्रायुषि ।
कारा-नामनि हन्त मागध-यमेनामी वयं नारके
क्षिप्तास् ते स्मृतिम् आकलय्य नरक-ध्वंसिन्न् इह प्राणिमः ॥४.७.११॥
 
 
अनुवाद
एक अन्य उदाहरण: "हमें मृत्यु के साक्षात् स्वरूप जरासंध ने इस कारागार में डाल दिया है, जो समस्त नरकों का सारांश है, जो भयंकर कीड़ों से भरे आँगन में पड़े हुए रोगी मनुष्यों के मल के ढेर से दृष्टि को नष्ट कर देता है, जिसकी दुर्गंध से नाक लड़खड़ा जाती है। हे नरक के नाश करनेवाले! हम केवल आपके स्मरण से ही अपने जीवन का निर्वाह करते हैं।"
 
Another example: "Jarasandha, the very embodiment of death, has cast us into this prison, which is the essence of all hells, which destroys the sight with heaps of feces of sick men lying in a courtyard infested with horrific insects, the stench of which makes the nose tremble. O destroyer of hells! We sustain our lives only by remembering you."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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