श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 6: भयानक-रस (भय)  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  4.6.9-10 
विभावस्य भ्रू-कुट्य्-आद्यास् तस्मिन्न् उद्दीपना मताः ।
मुख-शोषणम् उच्छ्वासः परावृत्य विलोकनम् ॥४.६.९॥
स्व-सङ्गोपनम् उद्घूर्णा शरणान्वेषणं तथा ।
क्रोशनाद्याः क्रियाश् चात्र सात्त्विकाश् चाश्रु-वर्जिताः ॥४.६.१०॥
 
 
अनुवाद
"भयानक-रस के उद्दीपन हैं, भय के पात्र में भौंहें चढ़ाना और अन्य प्रकार की धमकियाँ। अनुभव हैं, चेहरा सूखना, साँसें भारी होना, पीछे की ओर देखना, छिपना, अस्थिर होना, आश्रय ढूँढ़ना और चिल्लाना। आँसुओं को छोड़कर सभी सात्विक भाव भयानक-रस में प्रकट होते हैं।"
 
"The stimuli of bhayanaka-rasa are frowning and other forms of threats in the face of fear. The experiences are paleness of the face, heavy breathing, looking back, hiding, becoming unstable, seeking shelter, and screaming. All the sattvic emotions, except tears, are manifested in bhayanaka-rasa."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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