श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 6: भयानक-रस (भय)  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  4.6.16 
सदा भगवतो भीतिं गता आत्यन्तिकीम् अपि ।
कंसाद्या रति-शून्यत्वाद् अत्र नालम्बना मताः ॥४.६.१६॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि कंस जैसे राक्षस हर समय भगवान से अत्यंत भयभीत रहते हैं, किन्तु चूँकि यह भय रति से रहित है, इसलिए वे भयानक रस के लिए आश्रय नहीं हैं।
 
Although demons like Kamsa are always extremely afraid of the Lord, because this fear is devoid of passion, they are not the abode of fearful passion.
 
इति श्री-श्री-भक्ति-रसामृत-सिन्धाव् उत्तर-विभागे
गौण-भक्ति-रस-निरूपणे भयानक-भक्ति-रस-लहरी षष्ठी ॥
"इस प्रकार श्री भक्ति-रसामृत-सिंधु के उत्तरी महासागर में 'भयानक-रस' से संबंधित छठी लहर समाप्त होती है।"
 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas