श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 6: भयानक-रस (भय)  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  4.6.13-14 
तज्-जा भीर् नापरत्र स्याद् अनुग्राह्य-जनान् विना ।
आकृत्या ये प्रकृत्या ये ये प्रभावेण भीषणाः ॥४.६.१३॥
एतद्-आलम्बना भीतिः केवल-प्रेम-शालिषु ।
नारी-बालादिषु तथा प्रायेणात्रोपजायते ॥४.६.१४॥
 
 
अनुवाद
"यह भय-रति या भय भक्तों के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति में प्रकट नहीं होता। भयानक रूपों, गुणों और शक्तियों से उत्पन्न भय सामान्यतः स्त्रियों और छोटे बच्चों में कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम के कारण उत्पन्न होता है।"
 
"This bhaya-rati or fear does not appear in anyone except devotees. The fear caused by the terrifying forms, qualities and powers generally arises in women and small children due to pure love for Krishna."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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