श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 6: भयानक-रस (भय)  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.6.12 
अस्मिन् भग्न-रतिः स्थायी भावः स्याद् अपराधतः ।
भीषणेभ्यश् च तत्र स्याद् बहुधैवापराधिता ॥४.६.१२॥
 
 
अनुवाद
"भयानक-रस का स्थिर-भाव भय-रति है, जो अपराधों और भयभीत व्यक्तियों से उत्पन्न होता है। अपराध कई प्रकार के होते हैं।"
 
"The stable emotion of the horrific rasa is fear-love, which arises from crimes and frightened persons. There are many types of crimes."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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