श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 6: भयानक-रस (भय)  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  4.6.1 
वक्ष्यमाणैर् विभावाद्यैः पुष्टिं भय-रतिर् गता ।
भयानकाभिधो भक्ति-रसो धीरैर् उदीर्यते ॥४.६.१॥
 
 
अनुवाद
“बुद्धिमान लोग कहते हैं कि जब भय-रति विभावों और अन्य तत्वों [रस] द्वारा पोषित होती है तो वह भयावह-भक्ति-रस बन जाती है।”
 
“The wise say that when bhaya-rati is nourished by vibhavas and other elements [rasas] it becomes bhaya-bhakti-rasa.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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