श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 5: रौद्र-रस (क्रोध)  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.5.7 
गोवर्धनं महा-मल्लं विनान्येषां व्रजौकसाम् ।
सर्वेषाम् एव गोविन्दे रतिः प्रौढा विराजते ॥४.५.७॥
 
 
अनुवाद
“बलवान गोवर्धन (चन्द्रावली के पति) को छोड़कर, व्रज के सभी निवासी गोविंद के प्रति रति की सर्वोच्च अवस्था रखते हैं।”
 
“Except the mighty Govardhan (husband of Chandravali), all the inhabitants of Vraja are in the highest state of love for Govinda.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)