श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 5: रौद्र-रस (क्रोध)  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.5.33 
क्रोधाश्रयाणां शत्रूणां चैद्यादीनां स्वभावतः ।
क्रोधो रति-विनाभावान् न भक्ति-रसतां व्रजेत् ॥४.५.३३॥
 
 
अनुवाद
“शिशुपाल जैसे शत्रुओं का अंतर्निहित क्रोध, रति से रहित होने के कारण, भक्ति-रस नहीं बनता।”
 
“The inherent anger of enemies like Shishupal, being devoid of passion, does not become devotional.”
 
इति श्री-श्री-भक्ति-रसामृत-सिन्धाव् उत्तर-विभागे
गौण-भक्ति-रस-निरूपणे रौद्र-भक्ति-रस-लहरी पञ्चमी ॥
"इस प्रकार श्री भक्ति-रसामृत-सिंधु के उत्तरी महासागर में 'रौद्र-रस' से संबंधित पांचवीं लहर समाप्त होती है।"
 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd