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श्लोक 4.5.33  |
क्रोधाश्रयाणां शत्रूणां चैद्यादीनां स्वभावतः ।
क्रोधो रति-विनाभावान् न भक्ति-रसतां व्रजेत् ॥४.५.३३॥ |
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| अनुवाद |
| “शिशुपाल जैसे शत्रुओं का अंतर्निहित क्रोध, रति से रहित होने के कारण, भक्ति-रस नहीं बनता।” |
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| “The inherent anger of enemies like Shishupal, being devoid of passion, does not become devotional.” |
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इति श्री-श्री-भक्ति-रसामृत-सिन्धाव् उत्तर-विभागे
गौण-भक्ति-रस-निरूपणे रौद्र-भक्ति-रस-लहरी पञ्चमी ॥
"इस प्रकार श्री भक्ति-रसामृत-सिंधु के उत्तरी महासागर में 'रौद्र-रस' से संबंधित पांचवीं लहर समाप्त होती है।" |
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