श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 5: रौद्र-रस (क्रोध)  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  4.5.16 
तत्र स्वस्याहितः —
अहितः स्वस्य स स्याद् यः कृष्ण-सम्बन्ध-बाधकः ॥४.५.१६॥
 
 
अनुवाद
“जो लोग कृष्ण प्राप्ति में बाधा बनते हैं, वे अपने प्रति अमित्र हैं।”
 
“Those who become obstacles in attaining Krishna are enemies to themselves.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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