श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 5: रौद्र-रस (क्रोध)  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.5.12 
यथा —
गोविन्दः प्रिय-सुहृदां गिरैव यातस्
तालानां विपिनम् इति स्फुटं निशम्य ।
भ्रू-भेद-स्थपुटित-दृष्टिर् आद्यम् एषां
डिम्भानां व्रज-पति-गेहिनी ददर्श ॥४.५.१२॥
 
 
अनुवाद
“‘कृष्ण अपने प्रिय मित्रों के आदेश पर तालवन गए हैं।’ यह सुनकर यशोदा उन बालकों के चेहरों को घूरने लगीं और उनकी भौंहें ऊपर-नीचे होने लगीं।”
 
“‘Krishna has gone to Talavana on the orders of his dear friends.’ Hearing this, Yashoda stared at the faces of the boys and her eyebrows started moving up and down.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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