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श्लोक 4.3.8  |
सुहृद्-वरो, यथा —
सखि-प्रकर-मार्गणान् अगणितान् क्षिपन् सर्वतस्
तथाद्य लगुडं क्रमाद् भ्रमयति स्म दामा कृती ।
अमंस्त रचित-स्तुतिर् व्रजपतेस् तनुजो’प्य् अमुं
समृद्ध-पुलको यथा लगुड-पञ्जरान्तः-स्थितम् ॥४.३.८॥ |
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| अनुवाद |
| अपने परम मित्रों से युद्ध करते हुए: "कुशल श्रीदामा ने अपने सभी मित्रों द्वारा छोड़े गए चमड़े की नोक वाले असंख्य बाणों को अपनी छड़ी घुमाकर रोक दिया। नन्दपुत्र ने उसकी प्रशंसा करते हुए रोंगटे खड़े कर दिए, क्योंकि ऐसा प्रतीत हो रहा था कि श्रीदामा घूमती हुई छड़ी से बने एक विशाल पिंजरे में बंद हैं।" |
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| Fighting his best friends: "The skillful Sridama stopped countless leather-tipped arrows shot by all his friends by swinging his stick. Nanda's son, praising him, had goosebumps, for it seemed as if Sridama was confined in a huge cage made of a rotating stick." |
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