श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  4.3.61 
दानादि-त्रिविधं वीरं वर्णयन्तः परिस्फुटम् ।
धर्म-वीरं न मन्यन्ते कतिचिद् धनिकादयः ॥४.३.६१॥
 
 
अनुवाद
"धनिका जैसे कुछ विशेषज्ञों ने तीन प्रकार के वीर - दान-वीर, दया-वीर और युद्ध-वीर को स्वीकार किया है और धर्म-वीर को स्वीकार नहीं करते हैं।"
 
"Some experts like Dhanika have accepted three types of heroes - Dan-veera, Daya-veera and Yudh-veera and do not accept Dharma-veera."
 
इति श्री-श्री-भक्ति-रसामृत-सिन्धाव् उत्तर-विभागे
वीर-भक्ति-रस-निरूपणे अद्भुत-भक्ति-रस-लहरी तृतीया ॥
"इस प्रकार श्री भक्ति-रसामृत-सिंधु के उत्तरी महासागर में 'वीर-रस' से संबंधित तीसरी लहर समाप्त होती है।"
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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