श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 4: उत्तरी विभाग: गौण भक्ति रस  »  लहर 3: वीर्य-रस (शूरता)  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  4.3.59 
यज्ञः पूजा-विशेषो’स्य भुजाद्य्-अङ्गानि वैष्णवः ।
ध्यात्वेन्द्राद्य्-आश्रयत्वेन यद् एष्व् आहुतिर् अर्प्यते ॥४.३.५९॥
 
 
अनुवाद
"जब वैष्णव इन्द्र को यज्ञ अर्पित करते हैं, तो वैष्णव उस यज्ञ को भगवान की पूजा मानते हैं, तथा भगवान के उन अंगों की पूजा का ध्यान करते हैं, जो इन्द्र आदि को आश्रय देते हैं।"
 
"When Vaishnavas offer sacrifice to Indra, they consider that sacrifice to be worship of the Lord and meditate on worshipping those parts of the Lord which shelter Indra and others."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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